February 11, 2026

एम्स भोपाल में विश्व थैलेसीमिया दिवस पर जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन

भोपाल: 8 मई 2025

एम्स भोपाल में कार्यपालक निदेशक प्रो. (डॉ.) अजय सिंह के मार्गदर्शन में, अंतरराष्ट्रीय थैलेसीमिया दिवस के अवसर पर बाल रोग विभाग द्वारा एवं इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (IAP) के सहयोग से एक जागरूकता एवं परामर्श सत्र का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम एम्स के पीडियाट्रिक ओपीडी परिसर में आयोजित किया गया, जिसमें थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों के अभिभावकों सहित अन्य लोगों ने भाग लिया। वर्ष 2025 की थीम “थैलेसीमिया के लिए एकजुट: समुदायों को जोड़ना, रोगियों को प्राथमिकता देना”, इस रोग से लड़ने के लिए समुदाय-आधारित और समन्वित प्रयासों की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

कार्यक्रम में डीएम पीडियाट्रिक हीमैटोलॉजी-ऑन्कोलॉजी रेज़िडेंट डॉ. अनुराग मोहंती ने बताया कि जन्म के समय थैलेसीमिया के लक्षण दिखाई नहीं देते क्योंकि उस समय भ्रूणीय हीमोग्लोबिन उपस्थित रहता है। जब यह घटता है (6 माह से 2 वर्ष की उम्र तक), तब लक्षण सामने आते हैं जैसे कि पीला पड़ना और साँस फूलना। इन बच्चों को जीवनभर रक्त चढ़ाने की आवश्यकता होती है। प्रो. (डॉ.) गिरीश भट्ट ने बताया कि यदि थैलेसीमिया रोगियों का हीमोग्लोबिन स्तर 9 ग्राम प्रतिशत से ऊपर बनाए रखा जाए और साथ ही आयरन घटाने की दवा नियमित रूप से दी जाए तो वे चालीस से पचास वर्ष की आयु तक स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। दवा न लेने पर शरीर में लोहा (आयरन) जमा होकर अंगों को नुकसान पहुँचाता है। एमपीआईएपी अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) महेश महेश्वरी ने थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों में विकास और हार्मोन संबंधित समस्याओं की समय पर पहचान के लिए नियमित अनुवर्ती जांच की आवश्यकता पर बल दिया। डॉ. नरेंद्र चौधरी, पीडियाट्रिक हीमैटोलॉजिस्ट-ऑन्कोलॉजिस्ट ने एचएलए टाइपिंग और बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन की भूमिका समझाई, जिससे इस रोग को पूर्णतः ठीक किया जा सकता है और बच्चा सामान्य जीवन जी सकता है।

बाल रोग विभाग की प्रमुख प्रो. (डॉ.) शिखा मलिक ने समाज से अपील की कि विवाह से पूर्व थैलेसीमिया एवं अन्य बीमारियों की जांच अवश्य करवा लेनी चाहिए। उन्होंने बताया कि थैलेसीमिया माइनर व्यक्ति सामान्य दिखता है, परंतु यदि दोनों दंपति थैलेसीमिया माइनर हों तो उनके बच्चों में थैलेसीमिया मेजर होने की 25% संभावना होती है। वरिष्ठ रेज़िडेंट एवं जेनेटिक्स फेलो डॉ. पूजा सोनी ने गर्भस्थ शिशु में थैलेसीमिया मेजर की पहचान की प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। यह परीक्षण तभी संभव है जब गर्भवती महिला गर्भावस्था के पहले तीन महीनों में जांच कराए। यदि भ्रूण थैलेसीमिया से ग्रसित नहीं होता है, तो गर्भावस्था निःसंकोच जारी रखी जा सकती है। इस अवसर पर प्रो. (डॉ.) अजय सिंह ने कहा, “थैलेसीमिया के खिलाफ हमारी सबसे बड़ी शक्ति जागरूकता और समय पर हस्तक्षेप है। समाज को इस बीमारी के लक्षणों, उपचार और रोकथाम के बारे में जानकारी देकर हम न केवल जीवन बचा सकते हैं बल्कि जीवन की गुणवत्ता को भी बेहतर बना सकते हैं।”

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