February 11, 2026

मिनिमल इनवेसिव रेटो पेरिटोनियल लैप्रोस्कोपी (MIRL): बेहतर परिणाम, तेज़ रिकवरी और पीड़ा में कमी

भोपाल: 25 अक्टूबर 2025

एम्स भोपाल अपने उन्नत शोध कार्यों और चिकित्सा नवाचारों के माध्यम से सर्जिकल अनुसंधान में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। इसी क्रम में एम्स भोपाल के यूरोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. केतन मेहरा ने “रेट्रोपेरिटोनियल बनाम ट्रांसपेरिटोनियल लैप्रोस्कोपिक यूरोलॉजिकल सर्जरी में ऑपरेशन के दौरान होने वाले शारीरिक परिवर्तन और शल्य-परिणामों का तुलनात्मक अध्ययन” विषय पर अपना शोध कार्य 35वें वेस्ट ज़ोन यूरोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ़ इंडिया कॉन्फ्रेंस (WZUSICON 2025) अहमदाबाद में प्रस्तुत किया। अन्य संकाय सदस्य, डॉ. देवाशीष कौशल और डॉ. कुमार माधवन ने भी इस अध्ययन में भाग लिया और मार्गदर्शन प्रदान किया। यह अध्ययन फरवरी 2024 से मई 2025 के बीच एम्स भोपाल में किया गया, जिसमें 42 वयस्क रोगियों को शामिल किया गया जिन्होंने लैप्रोस्कोपिक नेफ्रेक्टॉमी और एड्रेनलेक्टॉमी सर्जरी कराई।

यह देश के कुछ चुनिंदा प्रॉस्पेक्टिव अध्ययनों में से एक है जो मूत्ररोग शल्यक्रियाओं की दो न्यूनतम इनवेसिव विधियों — रेट्रोपेरिटोनियल और ट्रांसपेरिटोनियल — की वैज्ञानिक तुलना करता है। अध्ययन के परिणामों में पाया गया कि दोनों तकनीकें सुरक्षित और प्रभावी हैं, किन्तु रेट्रोपेरिटोनियल विधि में बेहतर श्वसन मापदंड, कम रक्तस्राव, कम दर्द तथा कम अस्पताल प्रवास देखा गया, जिससे यह विशेष परिस्थितियों में अधिक लाभकारी सिद्ध हो सकती है।

एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक एवं सीईओ प्रो. (डॉ.) माधवानन्द कर, जो स्वयं एक उत्कृष्ट लैप्रोस्कोपिक सर्जन हैं, ने कहा कि इन शारीरिक भिन्नताओं की समझ सर्जनों को प्रत्येक रोगी के लिए उपयुक्त विधि चुनने में मदद कर सकती है, जिससे बेहतर परिणाम प्राप्त हों और जटिलताओं में कमी आए। उनके शोध को वैज्ञानिक दृढ़ता और नैदानिक उपयोगिता के लिए विशेषज्ञों द्वारा सराहा गया, जिससे न्यूनतम इनवेसिव यूरोलॉजिकल सर्जरी के क्षेत्र में एम्स भोपाल के शोध योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।

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