ब्रह्मकुमारीज भोपाल आश्रम में जानकी जी की पुण्यतिथि पर विधानसभा के प्रमुख सचिव अवधेश प्रताप सिंह जी ने श्रद्धांजलि पुष्प अर्पित की

भोपाल: 26 मार्च 2025

आज राजयोग भवन प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय में परम आदरणीय दादी जानकी जी की पुण्यतिथि पर विधानसभा के प्रमुख सचिव अवधेश प्रताप सिंह जी ने श्रद्धांजलि पुष्प अर्पित किये। तथा गोल्डन वर्ल्ड रिट्रीट सेंटर ग्वालियर से ब्रह्माकुमारी ज्योति बहन जी, पोरसा से राजयोगिनी रेखा बहन जी , तथा समस्त टीचर्स ने पुष्प अर्पित किये।परम आदरणीय बड़ी बहनजी ने दादी जानकी जी की विशेषताओं का वर्णन किया।और कहा राजयोगिनी दादी जानकी जी एक आध्यात्मिक गुरु थीं. उनका जन्म साल 1916 में पाकिस्तान के हैदराबाद सिंध में हुआ था. वे समाज कल्याण, समाज सेवा, और विश्व शांति के लिए समर्पित थीं. उन्होंने 100 देशों में ईश्वरीय पैगाम दिया और आध्यात्मिकता का परचम लहराया ।वे एक तपस्या की मूरत थीं.

वे 46 हज़ार बहनों की अभिभावक थीं.

वे एक अद्वितीय आध्यात्मिक सितारा थीं.

वे ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की पूर्व मुख्य प्रशासक थीं.

वे मूल्यों की शिक्षा के लिए लगातार प्रयासरत रही थीं.

वे बच्चों में श्रेष्ठ संस्कार और नैतिक मूल्यों के समावेश के लिए प्रयासरत रही थीं.

वे स्थिर चित्त आत्मा की खिताब से नवाज़ी गई थीं.

वे गुण दान में नंबर वन थीं.

दादी जानकी जी से जुड़े कुछ और तथ्य:

वे बचपन से ही आध्यात्मिकता और लोगों की सेवा करने में गहरी रुचि रखती थीं.

वे 21 साल की उम्र में ही ब्रह्माकुमारी संस्थान से जुड़ गई थीं.

उन्होंने 14 साल तक गुप्त तपस्या की थी.

गीतम विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि से नवाज़ा था.

(1) पहली बार बाबा से मुलाकात ( हैदराबाद 1936 ) दादी जी अपने लौकिक पिता के साथ प्रतिदिन प्रात: कालीन भ्रमण के लिए नजदीक की नदी के शहरी उद्यान में जाते थे । एक दिन जब वे उद्यान से लौट रहे थे ,उन्होंने दादा लेखराज को अपनी तरफ आते देखा। दादी जी के पिता जो की उम्र में दादा से छोटे थे , दादा को झुककर नमस्कार करने लगे लेकिन दादा ने ऐसा करने नहीं दिया । दादी जी ने मासूमियत से दादा को देखा तो उनमें शक्तिशाली प्रकाश का अनुभव किया । यह बहुत ही सुंदर पल था जो की दादा का दिव्य प्रकाशित मस्तक दादी जी को आकर्षित कर रहा था उसी समय दादी जी को बाबा से अलौकिक स्नेह

( रूहानी प्यार ) का तीर लगा जिससे लौकिक परिवार से उनका मोह प्राकृतिक रूप से छूटने लगा । दादी जी दिल ही दिल में यह जान गई की यही मेरे असली और मेरे अति प्यारे पिता है

(2) योग्य बनो तो प्रमाण दो ( कराची 1940) कराची में यह अक्सर होता था कि बाबा की बच्ची बाबा के साथ चैट के लिए इकट्ठे होते थे छत के दौरान किसी ने पूछा कि बाबा की हमारे पुरुषार्थ के प्रति क्या आशय है 52 उत्तर दिया कि हमेशा दो शब्द याद रखो योग व लाइक बच्चे बनो और प्यार और विश्वास का प्रमाण दो।

(3) एक विशाल बेहद की बुद्धि ( हैदराबाद ) बचपन से ही दादी का मस्तक बहुत बड़ा था शारीरिक रूप से बहुत सुंदर नहीं थी लौकिक जीवन में लोग इसकी आलोचना भी करते थे फिर भी दादी के मन में सदा एक ही विचार था , ” मैं जो भी हूं , जैसी भी हूं ,बाबा की प्यारी बच्ची हूं ।” इसलिए यह मैं एक प्यारा पल था जब दादी बाबा के पास आयी और बाबा ने दादी के इस मस्तक पर अपना दुआ भरा हाथ रखा। बाबा ने दादी के चेहरे को देखा और प्यार भरे शब्दों में कहा मीठे बच्चे सदा अपने मस्तक का ख्याल रखना यह बहुत बड़ा है अर्थात आप ज्ञान रत्नों से भरपूर विशाल बुद्धि की धनी हो।

( 7 ) ज्ञान को उगारना,अतीन्द्रिय आनंद का अनुभव करता है ( कराची )

शुरुआत में जब बच्चे ज्ञान को उतारते थे और अतीन्द्रिय सुख अनुभव करते थे तो बाबा को बड़ी खुशी होती थी । अतः दादी जी वह दूसरे बहने साथ में बैठकर ज्ञान मुरली की चिट चैट किया करती थी।

एक दिन सभी बहनें इकट्ठी बैठकर ज्ञान की चिटचैट कर रही थी । बाबा क्लीफ्टन से पैदल करके वापस पहुंचे ।उन्होंने देखा कि सभी ज्ञान मुरली के मंथन का आनंद ले रहे थे । बाबा बहुत खुश हुए और कहा, ” मीठे बच्चे, आप अतीन्द्रिय आनंद में हो, आओ, बाबा के साथ झूला झूलो।” बाबा ने दादी का हाथ पकड़ा और झूले में झुलाया।ये दादी के लिए बड़े ही आनंद के पल थे।

(8) स्वच्छ बुद्धि – एक बार दादी जी ने महसूस किया कि कोई झूठ बोल रहा है तो दादी उसकी रिपोर्ट लेकर बाबा के पास गई । बाबा ने कहा ” ये आपका कार्य नहीं है, आपका कार्य है अपने आप पर नजर रखना अपनी बुद्धि की लाइन सदा से बाबा के साथ क्लीयर रखो , बाकी किसी चीज के बारे में मत सोचो।”

(9) बाबा की फॉर्म ,फीचर और एक्टिविटी को फॉलो करना – अमृतवेले के बाद, मुरली से पहले बाबा मुरली पर विचार सागर मंथन करते थे । एक बार दादी जी अमृतसर में थे, तो बाबा ने दादी को कहा कि मुझे विश्वास है कि हर सुबह आप मुरली का विचार सागर मंथन करते हैं । उसे समय दादी जी इस तरह की प्रैक्टिस में इतने परिपक्व नहीं थे। दादी ने कहा , बाबा,मुझे सीखना है, मुरली को कैसे उगाया जायें ।इसके बाद दादी जी प्रतिदिन अमृतवेले पहले के बाद मुरली पर विचार सागर मंथन करने लगी ।ऐसे में दादी जी को मुरली उगारते हुए बाबा का चेहरा ,बाबा की दृष्टि सदा सम्मुख रहती थी ।इससे उसी समय के साथ-साथ दादी बाबा की पर्सनालिटी को प्राप्त करने लगी l